दुराचार

ट्रायल से पहले दुराचार के आरोपी शिकायत नही दर्ज कर सकतें है।

गुरुवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दुराचार के मामले में आपराधिक प्रक्रिया संहिंता की धारा १६४ के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये गए किसी आरोपी के खिलाफ किसी महिला द्वारा दिए गए बयान को लेकर मामला दर्ज करने का अधिकार नहीं है जब तक ट्रायल कोर्ट ने चार्ज शीट का संज्ञान न ले लिया हो।

यह नियम एक बहुचर्चित मामले के समय जब सत्तारूढ़ पूर्व मंत्री स्वामी चिन्मयानंद इसमें जुड़े थे जो वाजपेयी सरकार में गृह मंत्री थे।

न्यायाधीश विनीत सरन, एस रवींद्र भट और यूयू ललित की पीठ नेजिसने शिकायत की है उसके द्वारा दुराचार के आरोपी चिन्मयानंद पर सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज उस लड़की के बयान की एक प्रति देने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अस्वीकार कर दिया, जो शाहजहांपुर में पूर्व मंत्री के द्वारा चलाया गया आश्रम द्वारा प्रबंधित लॉ कॉलेज में एक कानून का छात्र था।

सुप्रीम कोर्ट कहना है की, ” खुद से आरोप पत्र दाखिल करने से बयान सहित कोड की धारा 164 के तहत किसी भी संबंधित दस्तावेज की प्रतियों के लिए उसको एक आरोपी नहीं कहा जा सकता है। आरोपी पत्र दाखिल होने के बाद जब तक अदालत द्वारा उचित आदेश पारित नहीं किया जाता है तब तक कोई भी व्यक्ति संहिता की धारा 164 के तहत जो बयान दर्ज हुआ है उसकी कॉपी के दावेदार नहीं होतें है। ”

जैसे कि हाथरस मामले को ही ले लें तो इसमें बड़े पैमाने पर मीडिया कवरेज को आकर्षित किया गया है, पूर्व मंत्री द्वारा दुराचार का आरोप वायरल होने के बाद उस लड़की ने सोशल मीडिया पोस्ट में पूर्वमंत्री चिन्मयानंद पर और भी कई लड़कियों के जीवन को तहस नहस करने का आरोप लगाया था।

पूर्वमंत्री ने आरोप को ब्लैकमेल करने की रणनीति और जवाबी कार्रवाई के रूप में उसको खारिज कर दिया था और कहा था कि 5 करोड़ रुपये की मांग की गई थी और धमकी भी दी गई थी कि पैसों का भुगतान न करने से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है। पिछले साल 30 अगस्त को एससी ने घटना का संज्ञान लिया था, जिस दिन राजस्थान के दौसा में उस लड़की का पता लगाया गया था।

सर्वोच्य न्यायालय द्वारा आदेश दिया गया था, कि “हम उस लड़की मिस ए द्वारा बताई गई शिकायतों और उसके माता-पिता जो आशंकये है उसके बारे में कोई राय नहीं व्यक्त कर रहे हैं। हम सभी को यह बताना चाहते है कि कानून में जो प्रक्रिया स्थापित है उसके अनुसार आशंकाओं / शिकायतों की शुद्धता को संबोधित किया जाना चाहिए।

उपरोक्त चीजों को मद्देनजर रखते हुए, हम उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, को निर्देशित करते है कि पुलिस महानिरीक्षक के पद पर एक पुलिस अधिकारी के निगरानी में एक विशेष टीम का गठन किया जाना चाहिए, जिससे पुलिस अधिकारियों की एक टीम और पुलिस अधीक्षक की सहायता की जा सकती है । मिस ए के माता-पिता द्वारा व्यक्त की गई आशंका और मिस ए द्वारा व्यक्त की गई शिकायत की जांच पड़ताल करने में मदद हो सकती है।

जांच करने के बाद आरोप पत्र दायर किया गया और शीघ ही सीआरपीसी की धारा 164 के तहत आरोपी शिकायतकर्ता के बयान की एक प्रति की आपूर्ति के लिए अदालत में भेजे गए जो उस आरोपी को एचसी ने दिया था। पीड़िता ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर कराइ थी।

नयायधीश ललित की पीठ ने कहा कि इस प्रक्रिया के लिए सर्वोच्य न्यायलय का स्पष्ट उल्लेख है कि सीआरपीसी धारा 164 के तहत जो गवाह ने जो बयान दिया है उसको जांच अधिकारी को सौंप दिया जाएगा ताकि वह चार्जशीट दाखिल करने से पहले किसी को भी इसके बारे में नही बताया जाये जिससे कोई उसका इसका खंडन न कर सकें।

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